संस्कृति

दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान राष्ट्रीय ग्रंथ क्यों

दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय संविधान राष्ट्रीय ग्रंथ क्यों

 देश की सबसे बड़ी शान और पहचान भारतीय संविधान  एक राष्ट्रीय ग्रंथ क्योंं। आइए जानते हैं विस्तार से बारे में बता रहे हैं  सुशील बाबू  सागर

भारतीय संविधान एक राष्ट्रीय ग्रंथ क्यों

Mera Samvidhaan Mera Swabhiman

देशके महानायक  भारत रत्न डॉक्टर भीमराव अंबेडकर साहब  ने जब से संविधान की रचना की। सबसे आखिर क्यों मनु वादी प्रवृत्ति के लोग लगातार भारतीय संविधान पर हमला बोलते आए हैं। देश की महान हस्ती भारत रतन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर साहब ने देश का संविधान लिख कर यह कभी नहीं सोचा होगा। उनके लिखे गये बेहतरीन संविधान पर चलने वाले लोग ही उन्हीं के संविधान का अपमान करेंगे।

भारतीय संविधान एक अद्वितीय दस्तावेज है और कानूनी ढांचे के लिहाज से एक अच्छा मसौदा है। यह वास्तव में प्रकृति में अद्वितीय है और  मैंने सभी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए नहीं, बल्कि केवल अद्वितीय तथ्यों को नोट हर संभव कोशिश की है

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भारतीय संविधान दुनिया के सबसे लंबे संविधान में से एक है (क्योंकि भारतीय संविधान के निर्माता डॉ भीमराव आंबेडकर ने इस तरह की दृष्टि के साथ उन्होंने कानूनी क्षेत्र में उपलब्ध संवैधानिक कानून की सभी आवश्यक विशेषताओं को शामिल किया था।)
हमारा संविधान संसदीय के साथ-साथ सरकार के  अध्यक्षीय के रूप में भी एक मिश्रण है। (ब्रिटेन में केवल संसदीय रूप है और संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल संसद का अध्यक्षीय रूप है
हमारा संविधान राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के रूप में कल्याणकारी राज्य के दिशा निर्देशों के लिए प्रदान करता है।
हमारा संविधान आम आदमी के अस्तित्व के लिए आवश्यक कुछ बुनियादी मौलिक अधिकारों के लिए प्रदान करता है। (ये अधिकार किसी सरकार द्वारा मनमाने ढंग से नहीं छीने जा सकते)।
हमारा संविधान “प्राकृतिक न्याय के कार्डिनल सिद्धांतों” के लिए भी प्रदान करता है। (लेख 14)।
हमारे संविधान ने राज्य द्वारा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में उपचार के लिए भी प्रावधान किया है (अनुच्छेद 32 और 226) “बिना उपाय के कोई अधिकार नहीं है”।
हमारा संविधान कानून के शासन का प्रावधान करता है और अनुच्छेद 50 द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया है।
हमारा संविधान न तो पूरी तरह से संघीय है (संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह) और न ही पूरी तरह से एकात्मक है, हमारे पास एक क्वैसिफेडरल सरकार है यानी। दोनों का मिश्रण ताकि यह समय की आवश्यकता के साथ बदल सके।
हमारा संविधान एकतरफा वयस्क मताधिकार के लिए प्रदान करता है (हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में से एक हैं और हमारी स्वतंत्रता के बाद से ऐसा जारी रहा है, अन्य राजनीतिक देशों की तुलना में अस्थिर राजनीतिक प्रणाली)।
हमारे संविधान ने विधायी शक्तियों को केंद्र सरकार और राज्य सरकार (केंद्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची) के बीच तार्किक रूप से वितरित किया है।
हमारे संविधान ने “सलस पॉपुली सुपरमा लिक्स” के सिद्धांत को भी शामिल किया है यानी लोगों का कल्याण।
हमारा संविधान न तो कठोर है (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका) और न ही लचीला, यह दोनों का संलयन है।
हमारे संविधान ने न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ माननीय सर्वोच्च न्यायालय को सशक्त बनाया है। (समय समय पर शीर्ष अदालत ने मनमाने कानूनों को सख्ती से खत्म किया है जो लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं)

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हमारा संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के विचार के लिए प्रदान करता है (सभी धर्मों पर विचार करते हुए सरकार तटस्थ है, अर्थात् सभी धर्मों के लिए समान। कुछ राष्ट्रों में राज्य का धर्म है)।
हमारा संविधान राजतंत्र और स्थापित लोकतंत्र के लिए प्रदान नहीं करता है। (सभी शीर्षक समाप्त कर दिए गए हैं)।
हमारा संविधान न केवल “शक्तियों के पृथक्करण” बल्कि “जांच और संतुलन की अवधारणा” भी प्रदान करता है। (जैसा कि “पावर कॉरपेट्स और पूर्ण पावर कॉरपेट्स बिल्कुल -लॉर्ड एक्टन” के रूप में देखा गया है)
अंत में, (आदर्श रूप में यह पहला होना चाहिए था) संविधान की प्रस्तावना में उल्लेख किया गया है “हम लोग यहाँ पूरी तरह सुरक्षित हैं।

इसलिए जब देश के हर नागरिक का अधिकार भारतीय संविधान में पूरी तरह सुरक्षित है। उस पवित्र भारतीय संविधान के सारे अपना सारा जीवन यापन कर रहा है। तो हमें हर हाल में इसे राष्ट्रीय ग्रंथ मान लेना चाहिए

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आइए जानते हैं भारतीय संविधान को लेकर भंते सुमेधानंद और एक ब्राह्मण के बीज का बेहतरीन संवाद

चाय की दुकान पर एक टी.वी. चैनल पर राष्ट्रीय ग्रंथ के सम्बंध में समीक्षा चल रही थी कि भागवत गीता में हर समस्या का निदान है तो उसे क्यों न राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाये । कुछ समय उपरांत भंते सुमेधानंद भी वहाँ पहुंच गए । एक तिलकधारी ब्राह्मण इस समीक्षा पर बड़े जोर जोर से तालियां पीट रहा था । भंते जी ने उस ब्राह्मण से पूछा कि आप भारतीय संविधान से संतुष्ट नही हैं , जो आप आलतू फालतू ग्रंथों को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करवाने के लिए तालियां पीट रहे हैं ।
ब्राह्मण – हे भंते ! भागवत गीता में हर समस्या का निदान है , इसलिए भागवत गीता राष्ट्रीय ग्रंथ होना चाहिए ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान भारतीय नागरिकों को क्या क्या अधिकार देता है ?
ब्राह्मण – हे भंते ! राजनैतिक , सामाजिक , धार्मिक एवं आर्थिक , सांस्कृतिक अधिकार ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भागवत गीता भारतीय नागरिकों को क्या क्या अधिकार देती है ?
ब्राह्मण – हे भंते ! राजनैतिक , सामाजिक , धार्मिक एवं आर्थिक , सांस्कृतिक अधिकार ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! आप लोग कहते हैं कि भागवत गीता राष्ट्रीय ग्रन्थ होना चाहिए ।
ब्राह्मण – हे भंते ! अवश्य होना चाहिए ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! आपकी गीता में कौन कौनसी समस्याओं का हल है , विस्तार से बतायेंगे ।
ब्राह्मण – हे भंते ! वह मुझे पता नही है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना करता है , जो सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय है जबकि गीता ब्राह्मणवादी सत्ता की बात करती है ।
ब्राह्मण – हे भंते ! ऐसा भागवत गीता में कहाँ लिखा है ?
श्रमण – हे ब्राह्मण ! ऐसा भागवत गीता के अध्याय 18 के श्लोक 41 और 42 में लिखा है ।
ब्राह्मण – हे भंते ! जाति और वर्ण के अनुसार सभी को अपने अपने कार्य करने में क्या हर्ज है ?
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान सम्पूर्ण भारतीय समाज के कल्याण की बात करता है , जबकि भागवत गीता अल्पजन ब्राह्मण समाज के कल्याण की बात करती है ।
ब्राह्मण – हे भंते ! चार वर्णीय व्यवस्था में ही सभी का कल्याण है । ब्राह्मण ईश्वर की संतान होने के कारण श्रेष्ठ है , उसका आदर सत्कार तो होना ही चाहिए ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान विभेद रहित समता , ममता और मानवता के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है , जबकि भागवत गीता चार वर्णीय व्यवस्था के अधीन भारतीय समाज का विघटन करती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! ये समाज का विघटन नही है , ये भगवान कृष्ण की गीता का उपदेश है कि हर मनुष्य को अपने वर्ण और जाति के अनुसार ही कर्म करना शुभ है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान समाजवादी स्वरूप की रचना करता है , जबकि भागवत गीता चार वर्णीय ऊँचनीच के समाज की रचना करती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! जाति तो कर्म के अनुसार बनती है , जिस मनुष्य ने पिछले जन्म में जैसे कर्म किये हैं , वैसी ही जाति में उस मनुष्य का जन्म होता है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान समस्त भारतीयों को सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक एवं धार्मिक न्याय का वचन देता है , जबकि भागवत गीता मात्र ब्राह्मणों के अधिकार का वचन देती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! गीता में भगवान कृष्ण की लिखी बात गलत थोड़े ही हो सकती है । इसी में सभी का भला है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को कोई भी धर्म को मानने , आचरण करने एवं प्रचार करने की स्वतन्त्रता देता है , जबकि भागवत गीता विदेशी आर्य संस्कृति अर्थात ब्राह्मणवाद को मान्य करती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! गीता ब्राह्मणवाद नही भगवान कृष्ण की वाणी है , वह वाणी ही भारतीय संस्कृति है , जो सभी के लिए शुभ है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान बहुजन हिताय – बहुजन सुखाय में विश्वास करता है , जबकि भागवत गीता अल्पजन हिताय – अल्पजन सुखाय में विश्वास करती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! भगवान कृष्ण ने गीता में साफ साफ लिखा है , अपने अपने वर्ण और जाति के कर्म करने से हर मनुष्य सुखी रहता है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान ऐसे अश्लील साहित्यों पर रोक लगाने की आज्ञा देता है , जो शिष्टाचार एवं सदाचार के विरुद्ध हैं , जबकि भागवत गीता बहुसंख्यक समाज में मनोविकार उत्पन्न करती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! मेहतर का कर्म सफाई करना है , तो उसको वही कार्य शुभ है और यदि उस कार्य को ब्राह्मण करेगा तो वह कार्य उसके लिए अशुभ है , ऐसा भगवान कृष्ण का गीता में आदेश है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान स्वतन्त्रता का मूल अधिकार प्रदान करता है , जबकि भागवत गीता चार वर्णीय व्यवस्था के अधीन भारतीय समाज को गुलाम बनाती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! गीता गुलाम नही बनाती है , भारतीय मनुष्यों को भगवान कृष्ण के उपदेशों का पालन करने का मार्गदर्शन करती है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान हर भारतीय को प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता का मूल अधिकार प्रदान है , जबकि भागवत गीता प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार मात्र ब्राह्मणों को देती है |
ब्राह्मण – हे भंते ! भगवान की वाणी में ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है , इसलिए उसकी जान अनमोल होती है । शेष मनुष्य कुत्ता बिल्ली की तरह होते हैं । जन्म लेते हैं और मर जाते हैं ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान शोषण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है , जबकि भागवत गीता चार वर्णीय व्यवस्था के अधीन तीनों नीच वर्णों का शोषण का अधिकार प्रदान करती है ।
ब्राह्मण – हे भंते ! गीता के अनुसार ये शोषण नही है , ये श्रेष्ठ ब्राह्मण की सेवा है । ब्राह्मण की सेवा भगवान की सेवा ही होती है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार प्रदान करता है , जबकि भागवत गीता ब्राह्मणी अल्पजनों के लिए संस्कृति और शिक्षा की स्थापना करती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान मैत्री के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है , जबकि भागवत गीता भाई – बन्धु एवं गुरुजनों के बीच रक्त पात के सिद्धांत का प्रतिपादन करती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान अनुच्छेद – 19 के अधीन स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान करता है , जबकि भागवत गीता अनुच्छेद 4/13 के अधीन परतन्त्रता का अधिकार प्रदान करती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता देता है , जबकि भागवत गीता 3/35 के अधीन वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नही देती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान शान्तिपूर्वक एवं निरायुध सम्मेलन की स्वतन्त्रता देता है , जबकि भागवत गीता 3/35 के अधीन शांतिपूर्वक एवं निरायुध सम्मेलन की स्वतन्त्रता नही देती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान विभेद रहित संघ बनाने की स्वतन्त्रता देता है , जबकि भागवत गीता 4/13 के अधीन गुण – कर्म के अनुसार संघों का निर्माण करती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान किसी भी स्थान में निवास करने की स्वतन्त्रता देता है , जबकि भागवत गीता 1/42 के अधीन वर्ण संकर सन्तान को रोकने के लिए एक ही स्थान पर निवास की स्वतन्त्रता नही देती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान किसी भी भाग में वृत्ति , उपजीविका , व्यापार या कारोबार की स्वतन्त्रता देता है , जबकि भागवत गीता 3/35 के अधीन वर्ण के अनुसार कर्म का आदेश देती है ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! भारतीय संविधान अनुच्छेद – 51 क में भारतीय नागरिकों को मूल कर्तव्य करने का आदेश देता है , जबकि भागवत गीता 3/35 के अधीन वर्णों के अनुसार मूल कर्तव्य करने का आदेश देती है |
श्रमण – हे ब्राह्मण ! अब बताइये सम्पूर्ण भारतीयों के लिए समता , ममता और मानवता का अधिकार भारतीय संविधान देता है या विदेशी आर्य ग्रन्थ भागवत गीता ।
ब्राह्मण – हे श्रमण ! भारतीय संविधान ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! आप भारतीय हैं या विदेशी ।
ब्राह्मण – हे भंते ! हम भारतीय हैं ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! आप भारतीय हैं तो आप सम्पूर्ण भारतीयों का कल्याण चाहते हैं या मात्र ब्राह्मणजनों का ।
ब्राह्मण – हे भंते ! हम सम्पूर्ण भारतीय लोगों का कल्याण चाहते हैं ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! यदि आप समस्त भारतीयों का कल्याण चाहते हैं तो आप भारतीय संविधान को राष्ट्रीय ग्रन्थ मानोगे या भागवत गीता को ।
ब्राह्मण – हे भंते ! हम भारतीय हैं और हम भारतीय संविधान का ही आदर सत्कार करेंगे ।
श्रमण – हे ब्राह्मण ! यदि आप भारतीय संविधान का आदर – सत्कार करते हैं तो राष्ट्रीय ग्रन्थ भारतीय संविधान है या भागवत गीता ।
ब्राह्मण – हे श्रमण ! भारतीय संविधान ही देश का राष्ट्रीय ग्रंथ

5 Comments

  1. लेखक को
    साधुवाद

    Reply
  2. Indian religion system is base of belief system. That’s why rules of varna and castism persists in india. Only constitution is solution to break up belief system 🙏🏻

    Reply

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